भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

निकहते-ज़ुल्फ़ से नीन्दों को बसा दे आकर / 'अख्तर' शीरानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

निकहते-ज़ुल्फ़ से नीन्दों को बसा दे आकर ।
मेरी जागी हुई रातों को सुला दे आकर ।

किस क़दर तीरओ-तारीक है दुनिया मेरी,
जल्वए-हुस्न की इक शमअ जला दे आकर ।

इश्क़ की चान्दनी रातें मुझे याद आती हैं,
उम्रे-रफ़्ता को मेरी मुझसे मिला दे आकर ।

जौके-नादीद में लज्ज़त है मगर नाज़ नहीं
आ मेरे इश्क़ को मग़रूर बना दे आकर ।