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निज़ामुद्दीन-15 / देवी प्रसाद मिश्र

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मुशायरा रात भर चलता रहा। लोगों का ये हाल था कि जैसे मय्यत में होकर लौटे हों। एक जबान जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि बीस-पचास साल से ज़्यादा नहीं बचने वाली उसमें इतना कोहराम था कि पूछिए मत। मतलब कि कोहराम ऐसा था कि अगर जबान नहीं भी बची रही तो कोहराम बचा रहेगा। ऐसी आम राय थी। मुशायरे के ख़त्म होते न होते पानी बरसने लगा और एक कराह की तरह अल्ला हू अकबर गूँजा जो टूटे दरवाज़ों, फटे कपड़ों, काँपती तसबीह, संकरी गलियों के बीच से होता मुँडेरों के ऊपर से मुर्गों के पंखों और एक लड़की के सात दिनों से झूलते दुपट्टे को छूता निकल गया। जिस लड़की के दुपट्टे का ज़िक्र है वह पिछले पाँच दिनों से बुखार में पड़ी है और छत पर आ नहीं सकी है और आना भी नहीं चाहती है और दिन भर रोती रहती है और मर जाना चाहती है और फिरोजाबाद की चूड़ी की फैक्टरी से निकाल दी गई है और ताई के यहाँ से लौट आई है और मामू के यहाँ मुरादाबाद जाना नहीं चाहती और न ही कतर और कुछ बताती नहीं कि क्या। कि क्या कुछ। कि क्या नहीं। मरी यही कहती है कि मर जाने दो। कि भाई उड़ा-उड़ा रहता है। कि पता नहीं क्या चाहता है। कि इस बीच कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है। तीन चार पुलिस वाले शायरों को ये ग़ाली देते हुए गली से निकले कि क़लाम को ये छोटा नहीं कर सकते थे क्या। जल्दी निपट जाते। एक पुलिस वाला फुटपाथ पर पड़े एक आदमी के पास खड़ा हो गया है और ये जानने की कोशिश कर रहा है कि आदमी सो रहा है या मर रहा है।