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निज़ामुद्दीन-3 / देवी प्रसाद मिश्र

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रहीम के मक़बरे में टहलते हुए ये लगता है कि रहीम अब मिले कि तब। वो नहीं मिलते हैं और एक कवि के दूसरे कवि से मिलने का हादसा फ़िलहाल तो टल जाता है। मक़बरे में घूमते हुए कबूतरों के फड़फड़ाने की आवाज़ें गूँज रही हैं और इस तरह की आवाज़ें कि भइये पानी रखना! मक़बरे में मैं घूम रहा हूं। वहाँ कोई आने वाला है कि मैं किसी के चले जाने की गूँज में टहल रहा हूँ। कि जैसे हिन्दी के बियाबान में अपनी ही क़ब्र के चारों तरफ़। एक फ़ोन आ रहा है - हो सकता है इस बात का कि जो क़यामत हिन्दी कविता को तबाह कर देगी वह आ रही है और सराय काले खाँ तक वह पहुँच भी गई है।