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निर्वाण / नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती

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कमाल है कि तब भी उतरती है रात!
स्तब्ध पैरों से चली जाती है निःशब्द पहाड़, मैदानों, प्रान्तों में
अतल आँखों से चाँदनी की कोमल आग दहका कर
अवाक स्वप्न रचती उतरती है रात
रात उतरती है अरण्य की निर्जन हवा में।

जबकि हृदय में ज़रा-सी भी तृप्ति नहीं
जर्जरित मन में दिन के ढल जाने की शान्ति नहीं
जिस उजाले में नदी, मैदान, जंगल उभर आते हैं
लाओ निर्वाण की आग की वह बारिश
उतार लाओ प्राणों की शान्ति
अन्तहीन चाँदनी की बाढ़।

मन उतरती है रात
मन में फिर से उतरती है रात, फिर से
हृदय से छलक कर जितनी उतरती है रात
उतनी ही होती है निर्जनता
रात, कि जैसे मन
और मन, कि जैसे जंगल
कोमल चाँदनी में उसकी बड़ी-सी टहनी झुलसने लगती है।

मूल बांग्ला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी