भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

नीग्रो माँ / बालकृष्ण काबरा 'एतेश' / लैंग्स्टन ह्यूज़

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बच्चो ! मैं लौट रही हूँ आज
तुम्हें बताने को कहानी उस लम्बे अन्धेरे रास्ते की
जिस पर चलना पड़ा मुझे,
जिसका अनुभव करना पड़ा मुझे
कि जीवित रह सके, बढ़ सके वंश।

देखो मेरे चेहरे को —
है यह रात की तरह काला
फिर भी चमकता सूर्य की तरह प्रेम के सच्चे प्रकाश से।

मैं हूँ वह काली लड़की जिसने पार किया लाल सागर
अपनी देह में लिए स्वातंत्र्य बीज।
मैं हूँ वह स्त्री जिसने खेतों में किया काम
और उगाया कपास और अनाज।
मैं हूँ वह जिसने परिश्रम किया गुलाम की तरह
जिसे काम के बदले मिली मार, मिला दुर्व्यवहार।
बच्चे मेरे बेच दिए गए, यहाँ तक कि पति भी,
न कोई सुरक्षा, न प्रेम, न आदर था मेरे लिए।

सुदूर दक्षिण के तीन सौ साल :
पर ईश्वर-कृपा से मैं उच्चारित करती रही
गीत और प्रार्थना।
ईश्वर कृपा से मेरी आत्मा में बसा स्वप्न इस्पात की तरह।
अब अपने बच्चों के जरिए पहुँच रही हूँ मैं अपने लक्ष्य तक।

अब अपने युवा और स्वतन्त्र बच्चों के जरिए
मैंने अनुभव किया है वरदान।
तब मैं न पढ़ सकी, न लिख सकी।
कुछ भी नहीं था सिवाय अन्धेरे के।
कभी-कभी थी घाटी आँसुओं से भरी
पर अकेले वर्षों को पार करती रही जैसे-तैसे।
कभी-कभी रहती थी सड़क पर तेज़ धूप
पर करते रहना पड़ता था काम ख़त्म होने तक :
थी यात्रा जारी, नहीं था मेरे लिए इसका अन्त —
थी मैं भावी स्वन्त्रता का बीज।
मैंने पाला सपने को, जिसे कोई न कर सकता था ख़त्म,
सीने में थी मेरे — नीग्रो माँ।
तब थी केवल आशा, पर अब तुम्हारे जरिए
काले बच्चों, मेरे सपने होंगे सच :

दुनिया के समस्त काले बच्चों
याद रखो मेरे पसीने को, दर्द को, हताशा को,
याद रखो दुख से लदे मेरे उन वर्षों को —
उन वर्षों को बदल दो रोशन भविष्य की मशाल में।
मेरे अतीत से बनाओ रास्ता रोशनी का
अन्धकार, अज्ञान और काली रात से परे।
गर्द हटाकर ऊँचाई पर फहराओ मेरी पताका।
स्वतन्त्र लोगों की तरह खड़े होकर मज़बूत करो मेरा भरोसा।
इंसाफ पर करो विश्वास, कोई न धकेल सके तुम्हें पीछे।
याद करो कोड़े की वह मार और ग़ुलामी की वह राह।
याद रखो संघर्ष और विरोध में शक्तिमान आज भी
किस तरह रोकते हैं तुम्हारा रास्ता, नकारते हैं तुम्हारी ज़िन्दगी —
पर तोड़कर अवरोध बढ़ते रहो हमेशा आगे।
हमेशा देखो ऊपर, सूरज और तारों की ओर।
ओ, मेरे काले बच्चों — मेरे स्वप्न, मेरी प्रार्थनाएँ तुम्हें
हमेशा-हमेशा ले जाएँ ऊँचाइयों की ओर —

नीग्रो माँ के बच्चों को कोई भी श्वेत भाई
नीचा दिखाने का दुस्साहस करे, तब तक हूँ मैं तुम्हारे साथ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : बालकृष्ण काबरा ’एतेश’