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न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने / राजीव रंजन प्रसाद

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न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।
वही कीमत कि जैसे हो, सुहागन लाश पर गहने।

फटे ही पाँव बो आया, पसीना कुछ बिबाई में
दिवाकर स्वर्ण बरसाये, मिला पत्थर खुदाई में
टपकते लार के बच्चे,..., कलेजा है कढाई में
नहीं फटता मरा अंबर, बडी हिम्मत ख़ुदाई में

बहुत है कर्ज, मर जाओ, सुकूं की नींद तो आये
है कम रस्सी, लटक जाओ, इसी फंदे में दो बहनें
न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।

अगर आदम कहो तो जानवर गाली समझता है
जलाओ, लूट लो, नोंचो यही आखिर मनुजता है
कोई बच्ची की अस्मत रौंद कर गर्दन दबाता है
कोई उसका कलेजा फाड कर, बेखौफ खाता है

जिसे बोली नहीं आती, उसे जब वासना खाती
हया की आँख भर आती, दया इतिहास में दहने
न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।

पिता लतखोर है, माँ घर में पोते ही की आया है
हर एक रावण का घर है, राम मेरे कैसी माया है
गला भाई का रेंता है, अगर आल्हा सुनाया है
बहुत अचरज में है धरती, दनुज आदम का जाया है

मरा है भ्रूण ही में राम, यह नूतन कहानी है
जलाते दशरथों को हम, जमाने तेरे क्या कहने
न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।


मशालों जलो, आग ही आग हो, राख हो, खाख़ हो
ज्वाल के मुख फटो, आग की बन नदी बह चलो
आँधियों बढ़ चलो, सागरो अब उबल भी पडो
खत्म हो सब यहाँ, “चुप” रहे, गढ़ चलो, बढ़ चलो

हो नयी फिर सुबह, लाल हों कोंपलें, अंकुरें हों नयी
खेत ही खेत को चाहिये साथियों परबत ढ़हने
न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।

10.09.2007