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पड़ाव / मनीष मूंदड़ा

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जि़न्दगी के कुछ पल
संकुचित से
सिहरे हुए
अभी भी मेरी मुऋी में कैद हैं
वो पल जिन्हें
लम्हो में तब्दील होना मंजूर न था
वो पल, जिन्हें मुझसे दूर जाना मंजूर न था
मेरी गीली मुऋी में पसीजते हुए पलना चाहते है
वो मेरे अपने अंतर्द्वद का हिस्सा बन
मुझमे ही पिघलना चाहते है
श्याद वक़्त से ज़्यादा मुझमे भरोसा है इन्हें

या फिर
मेरे अपने संकुचन, मेरी अपनी सिरहन
मेरे अपने अतिरेक होने के डर में
कही उन्हें अपना पड़ाव दिखता हैं