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पत्तियाँ हो गईं हरी देखो / शीन काफ़ निज़ाम

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पत्तियाँ हो गईं हरी देखो
ख़ुद से बाहर भी तो कभी देखो

फिर खिली क्या कोई कली देखो
शोर है क्यूँ गली-गली देखो

याद और याद को भूलाने में
उम्र की फ़स्ल कट गई देखो

मार[1] कोई शिकार पर निकला
दश्त में रोशनी हुई देखो

रात की राख मुँह प' मल-मल कर
सुबह कितनी सँवर गई देखो

सुबह की फ़िक़्र बाद में करना
रात कितनी गुज़र गई देखो

ज़िंदगी किस तरह तुम्हारी "निज़ाम"
उलझनों से उलझ गई देखो

शब्दार्थ
  1. साँप