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पत्थर / शंख घोष / प्रयाग शुक्ल

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पत्थर, धरा है खुद मैंने यह छाती पर रोज़-रोज़
और अब उतार नहीं पाता ।

धिक् ! मेरी ग़लतियों, परे जाओ, उतरो
मैं फिर से शुरू करूँ,
फिर से खड़ा हूँ, जैसे खड़ा होता है आदमी ।
तैरते हुए दिन और हाथों के कोटर में लिपटी हैं रातें
क्योंकर उम्मीद है, समझ लेंगे दूसरे?
पूरी देह जुड़कर भी जगा सकी नहीं है कोई नवीनता ।

जन्महीन महाशून्य घेरे में,
बरसों तक पल-प्रतिपल
किसकी की पूजा?

अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो ।

चुपके-से कहता हूँ आज, तू उतर जा, उतर जा
पत्थर ! धरा था तुझे छाती पर,
मानकर देवता
अब मैं गया हूँ तुझे ठीक से पहचान !

मूल बंगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल
(हिन्दी में प्रकाशित काव्य-संग्रह “मेघ जैसा मनुष्य" में संकलित)