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पत्नी के नाम खत / नाज़िम हिक़मत / उज्ज्वल भट्टाचार्य

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11-11-1933
बुरसा जेल

मेरी और मेरी सबकुछ !
आख़िरी खत में तुमने लिखा है :
“मेरा सिर तनाव से काँपता है
मेरा दिल रुक-सा गया है !”
 
तुम कहती हो :
“अगर वे तुम्हें फाँसी पर लटकाते हैं,
अगर मैं तुम्हें खो बैठती हूँ,
मैं मर जाऊँगी !”
 
तुम जीती रहोगी, मेरी प्रियतमा...
हवा में काले धुएँ की तरह मेरी याद ग़ायब हो जाएगी ।
बेशक तुम जीती रहोगी, लाल बालों वाली मेरे दिल की रानी :
बीसवीं सदी में
मातम की मियाद
ज़्यादा से ज़्यादा साल भर की होती है ।

मौत...
रस्सी से लटकता एक जिस्म ।
मेरे दिल को
ऐसी एक मौत मँज़ूर नहीं ।
लेकिन
एक बात जान लो
अगर किसी बेचारे जिप्सी का
मकड़े जैसा काला हाथ
मेरे गरदन पर
एक फाँस लगाता है
नाज़िम की
नीली आँखों में
बेकार ही वे तलाशेंगे डर ।
मेरी आख़िरी सुबह की मद्धिम रोशनी में
अपने दोस्तों से और तुमसे मिलूँगा,
और मैं बढ़ जाऊँगा
अपनी क़ब्र की ओर
अफ़सोस गर होगा तो सिर्फ़ एक अधूरे गीत पर ...
मेरी बीवी
साफ़ दिल,
सुनहली,
शहद से भी मीठी तुम्हारी आँखें...मेरी मधुमक्खी !

आख़िर मैंने क्यों लिखा
कि वे मुझे फाँसी देना चाहते हैं ?
मुक़दमा तो बस शुरू ही हुआ है,
और वे शलजम की तरह
किसी का गला काटकर नहीं उड़ाते हैं ।

देखो, यह सब भूल जाओ ।
अगर कुछ पैसे हों,
मेरे लिये गर्म चड्डियाँ ले आना :
कमर का दर्द फिर से बढ़ गया है ।

और भूल मत जाना,
क़ैदी की बीवी को
अच्छी-अच्छी बातें सोचनी हैं ।

2
 
हवा बहती है और गुज़र जाती है,
चेरी की एक ही शाखें एक ही हवा में
कभी दोबारा नहीं डोलती हैं |
पेड़ों पर पँछी गा रहे हैं :
डैने उड़ जाने को बेताब हैं.
दरवाज़ा बन्द है :
उसे धकेलकर खोलना है ।

मैं तुम्हें चाहता हूँ :
ज़िन्दगी तुम्हारी तरह हसीन होनी चाहिए,
तुम सा एक दोस्त, तुम सी माशूका ...
मुझे पता है, दुखों का सिलसिला
अभी ख़त्म नहीं हुआ है,
लेकिन उसे ख़त्म होना है ।

3

नीचे झुककर मैं धरती को देख रहा हूँ
मैं चमकीले बौर से लदी शाखों को देख रहा हूँ
तुम बहार की धरती जैसी हो मेरी प्रियतमा
मैं तुम्हें देख रहा हूँ

पीठ के बल लेटकर मैं आसमान देखता हूँ
तुम बहार-सी हो, तुम आसमान-सी हो
मेरी प्रियतमा ! मैं तुम्हें देखता हूँ ।

रात को मैं आग जलाता हूँ, आग को छूता हूँ
तुम सितारों के तले जलाई गई आग जैसी हो
मेरी प्रियतमा मैं तुम्हें छूता हूँ ।

मैं इनसानों के बीच हूँ, मुझे इनसानियत से प्यार है
मुझे कुछ करने से प्यार है
मुझे विचारों से प्यार है
मुझे सँघर्ष से प्यार है
मेरे सँघर्ष के बीच तुम एक इनसान हो, मेरी प्रियतमा !
मुझे तुमसे प्यार है ।

4

इस्ताम्बूल की बदहाली — वे कहते हैं — कहना दुश्वार है,
भूख — वे कहते हैं — कितनों की जानें लिए जा रही है,
तपेदिक — वे कहते हैं चारों ओर फैल चुकी है ।
नन्हीं सी बच्चियां वे कहते हैं —
तँग गलियों, सिनेमा हॉलों में मिल जाती हैं ।

दूर मेरे शहर से बुरी ख़बरें आती जा रही हैं :
ईमानदार, बहादुर, ग़रीब लोगों का शहर
मेरा असली इस्ताम्बूल ।

जानेमन ! यह वो जगह है, जहाँ तुम रहती हो,
यह वह शहर है
जिसे मैं अपनी पीठ पर, अपने बस्ते में ढोता हूँ
जब भी जलावतन होता हूँ, जेल में होता हूँ,
बच्चे की मौत से हुए तीखे दर्द की मानिन्द
मैं उसे दिल में ढोता रहता हूँ ।
यह वह शहर है
तुम्हारी तस्वीर की तरह जिसे मैं आँखों में सँजोये रखता हूँ ।

5

नौ बजने वाले हैं
चौक पर घण्टा बज चुका है
कोठरी के दरवाज़े बन्द होने ही वाले हैं ।
इस बार जेल की मियाद कुछ ज़्यादा ही लम्बी है
आठ साल ।
मेरी प्रियतमा ! जीना एक उम्मीद से भरा काम है
जीना : उतना ही सँजीदा है, जितना कि तुम्हें प्यार करना ।
 
तुम्हारी सोच हसीन
उम्मीदों से भरी है
लेकिन अब उम्मीद से मुझे सुकून नहीं मिलता
मैं गाना सुनना नहीं चाहता हूँ
मैं अपना गीत गाना चाहता हूँ ।

6

गर्म और ज़िन्दादिल
नसों से बहते ख़ून की मानिन्द
जनूबी हवा बहती है ।
धुन सुन रहा हूँ
नब्ज़ धीमी चल रही है ।
उलुदाघ की चोटी पर बर्फ़ गिर रही होगी ।
और वहाँ रीछ
शाहबलूत के झरे लाल पत्तों पर
मीठी ख़ूबसूरत नीन्द में खोए हुए हैं ।
वादियों में बेदमजनूँ के पत्ते भी झर रहे हैं
रेशम के कीड़े अपने खोल में छिपने वाले हैं ।
पतझड़ का मौसम ख़त्म होने वाला है
धरती गहरी नीन्द में सो जाएगी ।

फिर एक बार जाड़े का मौसम बीत जाएगा
हम फिर से ताज़ा हो उठेंगे
अपने गुस्से की आग़
और अपनी पाक उम्मीद के साथ ।

7

हमारा बेटा बीमार है
उसका बाप जेल में है
तुम्हारे थके हाथों में धँसा हुआ है भारी माथा
हम एक ही जगह हैं, हम और हमारी दुनिया ।

इनसान इनसानों को ले जाएँगे
बदहाली से बेहतर दिनों की ओर
हमारा बेटा तन्दुरुस्त हो जाएगा
उसका बाप जेल से लौट आएगा
अपनी सुनहरी आँखों के साथ तुम मुस्कराओगी
हम एक ही जगह हैं, हम और हमारी दुनिया ।

8

सबसे ख़ूबसूरत समन्दर
अभी तक हमने देखा नहीं,
सबसे ख़ूबसूरत बच्चा
अभी तक बड़ा नहीं हुआ ।
हमारा सबसे ख़ूबसूरत वक़्त
अभी तक हमने जिया नहीं
और सबसे ख़ूबसूरत बातें, जो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ
अभी तक मैंने कहा नहीं ।

9

सपने में कल रात मैंने तुम्हें देखा
अपना सिर उठाकर
अपनी अम्बर आँखों से तुमने मुझे देखा
तुम्हारे नम होंठ हिल रहे थे
लेकिन मैं तुम्हारी आवाज़ सुन नहीं पाया ।

अन्धेरी रात में ख़ुशख़बरी की तरह घड़ी के घण्टे की आवाज़
मुझे हवा में वक़्त की फुसफुसाहट सुनाई देती है
मेरे लाल पिंजरे में मेमो[1] का गीत
जुते हुए खेत में
धरती का सीना फाड़कर बीज के उभरने का शोर,
और भीड़ से गूँजते ज़ोरदार नारे ।

तुम्हारे नम होंठ हिल रहे थे
लेकिन मैं तुम्हारी आवाज़ सुन नहीं पाया ।
नाराज़गी के साथ मैं जग उठा ।
किताब पर सिर रखकर मैं सो गया था ।

इतनी सारी आवाज़ों के बीच
क्या मैंने तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी ?

अँग्रेज़ी से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

शब्दार्थ
  1. तुर्क लोकगीतों का नायक डकैत, जो अमीरों की सम्पत्ति लूटकर ग़रीबों के बीच बाँट देता था ।