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पनघट भी प्यासा है(माहिया) /रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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31
ये जीवन था सोना ,
किसकी नज़र लगी
अब माटी हर कोना ।
32
 परिभाषा अपनों की
समझ न पाए थे
 पीड़ा हम सपनों की ।
33
तू सपने में आया
बिन बात रुलाना
हमको न ज़रा भाया ।
34
पनघट भी प्यासा है
गर ओ बूँद मिले
बचने की आशा है ।
35
जो मीत हमारे थे
धोखा देने में
दुश्मन भी हारे थे ।
36
बिन मौत न हम मरते
तुमने दे डाले
वे घाव नहीं भरते ।
37
जीवन था चन्दन-वन
ऐसी आग लगी
झुलसा है तन औ मन ।
38
क्या रूप निराले हैं
वेश धरे उजले
मन इनके काले हैं ।
39
उपदेश सुनाते हैं
खुद दुष्कर्म करें
जग को बहकाते हैं ।
40
जनता बेहाल हुई
गुण्डों की टोली
अब मालामाल हुई ।
41
पर निश-दिन कतरे हैं
सच्चे लोग यहाँ
लगते अब खतरे हैं ।