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पराई राहें / अज्ञेय

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दूर सागर पार
पराए देश की अनजानी राहें।
पर शीलवान तरुओं की
गुरु, उदार
पहचानी हुई छाँहें।
छनी हुई धूप की सुनहली कनी को बीन,
तिनके की लघु अनी मनके-सी बींध, गूँथ, फेरती
सुमिरनी,
पूछ बैठी :
कहाँ, पर कहाँ वे ममतामयी बाँहें ?

ब्रुसेल्स (एक कहवाघर के बाहर खड़े), 15 मई, 1960