भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पर-बेपर की / सुकुमार राय

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेघों की दुनिया में अन्धियारी रात,
इन्द्रधनु-आलोक-छाया के साथ,
ताल-बेताल और मनमाने सुर
गान शुरू करता हूँ खोल कण्ठ-उर।

यहाँ कुछ मना नहीं जो भी मन आए
उसको ही नियम मान निर्बंध गाए,
इस देश रंग भरे आसमान तले
सपनों के झूलों को हवा डुला चले,
मस्ती से अपनी लय झरना है बहता,
आकाश-कुसुम यहाँ आप खिला रहता,
रँगती है आसमान रँगती है मन
बिजली की कौंध जो कि उठती क्षण-क्षण।

जाने से पहले आज बोलूँगा भाई
वही कुछ बातें जो मेरे मन आईं,
भले ही निरर्थक हों बिलकुल बेमानी,
ज़्यादातर लोग समझ ही न पाएँ, यानी,
मैं तो आज अपने हाथ अपने को यार,
डुबाने चला हूँ कल्पना की जलधार।

बात चल निकली तो रोकेगा कौन?
आज के दिन हमें टोकेगा कौन?
अन्तर में बज रहा है धा-धा तु-ना
तबले का बोल कोई सुना-अनसुना;
मार खटाखट छप छपाछप छप
गप्पों की पेंच काटे उनसे बड़ी गप।
रोशनी में छुपी अन्धियारे की गन्ध,
जिससे कि घण्टा बजे सदा रसवन्त।

प्राणों में छुपे हुए सपनों के दूत
रंगमंच नृत्य-रत पंच महाभूत,
स्थूल उदर हाथियों को शून्य में उठाए
हाथ-पाँव से पकड़े कोई झुलाए।
रानी मधुमक्खी इधर पक्षिराज उधर
कल का शैतान बच्चा आज गया सुधर।
हिमयुग की चाँदनी में चाँदी-सी बर्फ़
खीसे में घोड़ी का अण्डा है सिर्फ़।

घोर नींद घेर रही अब तो इत्यलम्
क्योंकि मेरा गाने का वक़्त हुआ ख़तम।

शिव किशोर तिवारी द्वारा मूल बांग्ला से अनूदित

यह सुकुमार सेन की आख़िरी कविता है जो १९२२ में उनकी मृत्यु के ठीक पहले लिखी गई थी। कविता में स्पष्ट संकेत हैं कि कवि को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। इसके पहले वे लगभग ढाई साल से बीमार चल रहे थे, पर लिखना ज़ारी रहा था और साथ-साथ अपनी पत्रिका 'सन्देश' का सम्पादन और प्रकाशन भी अविरत चलता रहा था। इस कविता की रचना के एकाध दिन के भीतर सुकुमार सेन की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय उम्र - 36 साल में दो माह कम।
यह पूरी तरह से नॉनसेंस वर्स है। कविता के अन्त में "घोड़ी के अण्डे" का ज़िक्र पूरी कविता को परिभाषित करता है।
सुकुमार रॉय- आबोल ताबोल

और लीजिए, अब पढ़िए यही कविता मूल बांग्ला में