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पल-पल नव छवि दिखलाते हैं, ये दीवारों के साये / दरवेश भारती

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पल-पल नव छवि दिखलाते हैं, ये दीवारों के साये
किसका साथ निभा पाते हैं, ये दीवारों के साये

दुख की तपती दोपहरी के बाद मिलेगी ठण्डक भी
यह विश्वास दिला जाते हैं, ये दीवारों के साये

बनकर मिटना, मिटकर बनना, युग-युग से है ये जारी
मर्म यही तो समझाते हैं, ये दीवारों के साये

पा जायें विस्तार कभी तो हो जायें ये शून्य कभी
सुख-दुख क्या हैं बतलाते हैं, ये दीवारों के साये

सिर पर तपते सूरज को जब देखा तो ब्याकुल होकर
खुद में ही सिमटे जाते हैं, ये दीवारों के साये

उजली और सुनहरी छवियाँ बन बहलायें ख़ूब कभी
और कभी फन लहराते हैं, ये दीवारों के साये

ऐ 'दरवेश' बनाकर अपना रूप भयंकर दानव-सा
मानव का मन दहलाते हैं, ये दीवारों के साये