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पहाड़ी नदी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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151
मन-आँगन
बहे मधुर वात
सुख सरसे ।
152
कभी न मिला
तुझसा कोई मीत
अब न गिला ।
153
मौन टूटा है
सौरभ का झरना
 मानों फूटा है ।
154
आँखों की नमी
बिना बोले कहती-
क्या-क्या है कमी !
155
पहाड़ी नदी
बलखाती कमर
किसी मुग्धा की।
156
प्यासी डालियाँ
ताल - नीर चूमती
मुग्ध झूमती
157
साँस-साँस में
बँधी रेशम –डोरी
टूटे न कभी ।
158
पावन प्यार
भूले हैं बहनों का
पशु पुरुष ।
159
धूलि हैं धन
जिसको मिली प्यारी
सच्ची बहन ।
160
पावन मन
प्राणों में बसी हुई
सभी बहन ।
161
जीवन जाए
किसी बहन पर
आँच न आए ।
162
नन्हा फ़रिश्ता
जुड़ा गया इससे
मन का रिश्ता ।
163
सदा मुस्काए
हर भोर पथ में
 फूल बिछाए।
164
सारे ही रिश्ते
बन मोह का फ़न्दा
रखते जिन्दा
165
रक्त कमल
उतरे नयनों में
डोरे बनके ।