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पाँच ही तत्त के लागल हटिया / कबीर

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पाँच ही तत्त के लागल हटिया,
सौदा करै ले जायब हम सखिया।
कि आहो साधू हो! गुरु हो गोविन्द गुण गायब,
गेहुँमा पिसायब रे की॥1॥
हाथ के लेलौं सखी सुरति चंगेरिया,
पिसै ले गेलौं हम गुरु जतिया।
कि आहो साधू हो! धीरे-धीरे बहत बयार,
पिसत मन लागल रे की॥2॥
पिण्ड ब्रह्मांड केरो दोनों पल जतवा,
चाँद सुरज के दोनों लागल हथरा।
कि आहो साधू हो! केवल नाम सोहम्,
सुरत बोलै रे की॥3॥
मन दई पिसलन, चित्त दई उठलौं।
कि आहो साधू हो! काम क्रोध ठक चोकर,
चालि के निकालब रे की॥4॥
मन केरो मैदा सखी, तन केरो कढ़इया।
कि आहो साधू हो! ब्रह्म अगिन उदगार से,
पुरिया पकायब रे की॥5॥
से हो पुरिया भेजबै हम, गुरु के संदेसवा,
गुरु पाई मोरा तन मेटतै कलेसवा।
कि आहो साधू हो! मानुष जनम अनूप,
बहुरि नहिं पायब रे की॥6॥
साहेब कबीर येहो, गौलन जतसरिया।
कि आहो साधू हो! अबकि जनम,
बहुरि नहिं पायब रे की॥7॥