भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पाण्डू गये आश्रम के म्हां, ले गैल द्रौपदी राणी नै / राजेराम भारद्वाज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

                            (14)

सांग:– चमन ऋषि– सुकन्या (अनुक्रमांक– 2)

वार्ता:- सज्जनों! जब पाण्डवों को वनवास मिला हुआ था उस समय पांचों पाण्डव और साथ में द्रौपदी रानी लोमश ऋषि के आश्रम में गये। उन्हें देखते ही ऋषिवर ने पूछा- हे राजन् द्रौपदी रानी के साथ वन में विचरण करते हो। क्या कारण है मुझे बताईये। धर्म पुत्र युधिष्ठिर ने कहा- ऋषिवर! हमारे जैसा इस संसार में दुखी कोई नहीं है। हमारा राज्य कौरवों ने धोखे से जीत लिया। इसलिए वनवासी हुए फिरते है। धर्म पुत्र की बात सुनकर ऋषिवर लोमश ने कहा- हे महारथी पाण्डव नंदन तुम तो कुछ भी दुखी नहीं हो। मै आपको प्राचीन इतिहास सुनाता हॅू। च्यवन ऋषि और सुकन्या का किस्सा सुन। बारह वर्ष की सुकन्या ने अपने बूढे़ पति च्यवन ऋषि को जो अंधा था उसने प्रतिव्रता धर्म से और सतीत्व से जवान बना लिया था। कवि ने फिर लोमश ऋषि की वाणी को कैसे दर्शाते है।

जवाब:- कवि का।

पाण्डू गये आश्रम के म्हां, ले गैल द्रौपदी राणी नै,
लोमश ऋषि बतावण लागे, एक प्राचीन कहाणी नै ।। टेक ।।

परमजोत परमेश्वर नै, शक्ति से आसमान रचे,
नाभि से कमल, कमल से ब्रह्मा, जिसनै सकल जहान रचे,
ग्यारह रूद्र रचे क्रोध से, फिर सबके अस्थान रचे,
बामे अंग तै शतरूपा नारी, स्वयंभू मनु जवान रचे,
उन दोनों का ब्याह करवाया, खुद ब्रह्मा ब्रह्माणी ने।।

बारह सूर्य छप्पन चांद, 51 विष्णु विश्वे बीस हुए,
जल वायु से जगत रचाया, जगत पिता जगदीश हुए,
14 मनु 700 इन्द्र, कल्प में एक महीश हुए,
सामवेद संगीत कला मै, नृत राग छतीस हुए,
तीन ताल सुर सात बताये, सरस्वती कल्याणी ने।।

ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि के कश्यप, कश्यप कै तेरह नारी,
तेरहा के मनुज देवता, निश्चर-किन्नर गंधर्व देह धारी,
कश्यप का बेटा होया सूर्य, करदी अगन-पवन जारी,
अण्ड-पिण्ड उद्भेज-जेरण्ड से, देई रच दुनिया सारी,
मोह माया से मिथुन सृष्टि, रची आग और पाणी नै।।

सूर्य कै बेटा हुआ मनु, जिसनै दस अश्वमेघ रचाई थी,
दस पुत्र हुई कन्या ग्यारहवी, जो बुध गैला परणाई थी,
दसवां पुत्र शर्याति राजा, जिसकै सुकन्या जाई थी,
भृगुवंशी खानदान में वा, च्यवन ऋषि के ब्याही थी,
कहै राजेराम कथा महाभारत मैं, देख ब्यास की वाणी नै।।