भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पामाले-आसमां हूँ कि उठते नहीं क़दम / मेला राम 'वफ़ा'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पामाले-आसमां हूँ कि उठते नहीं क़दम
मरदूदे-कारवां हूँ कि उठते नहीं क़दम

या चैन से न बैठने देता था पाए-शौक़
या इतना नातुवां हूँ कि उठते नहीं क़दम

सुनता हूँ सख़्त सुस्त बहुत हमराहों से मैं
इस पर भी बे-ज़बां हूँ कि उठते नहीं क़दम

या रब ये जलवा-गाह हूँ किस रश्क़े-माह की
या रब ये मैं कहां हूँ कि उठते नहीं क़दम

होता है शुबह राहनुमा पर रक़ीब का
इस दर्जा बदगुमां हूँ कि उठते नहीं क़दम

राहे-तलब में आब्ला-पाई से ऐ 'वफ़ा'
अपने पे भी गिरां हूँ कि उठते नहीं क़दम