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पार्टी / आन्द्रेय वाज़्नेसेंस्की

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नशे में धुत्त बैठ गए
सब के सब नाविक । अकस्मात...
कहाँ हैं वे ।
        ....वे दो ?
यहाँ नहीं ।
        ....लगता है गए ।

क्या उनको उड़ा ले गया वह तूफ़ान
उठा कर आमोद-प्रमोद के बीच से ?
छूट कर पीछे रह गई हैं दो
खाली कुर्सियाँ, दो खंजर !

अभी-अभी दोनों पी रहे थे ।
अभी-अभी यहीं थे । क्षण भर में
क्या हुआ, दृष्टि से
ओझल कहाँ गए वे ?

निकल गए वे दो, दौड़ कर, कीचड़ से बाहर
संसार में, पकड़ो यदि पकड़ सको तुम,
फेंक दिया उन्होंने स्वयं को मझधार में
भाड़ में जाए कानून, जहन्नुम में बरसाती कोट ।

जैसे ही रुकती है मदिरा के प्याले पर थिरक रही उँगलियाँ
वैसे ही रुकता है प्याले से उठता संगीत,
इसी तरह नदी गुज़र जाती है अपने कछार से,
इसी तरह ऊपर-ऊपर गुज़र जाते हैं मेघ
इसी तरह अन्त में नौजवान बूढ़ों को देता है चुनौती ।

ठीक है कि बड़ी कामयाब है
पार्टी : मगर इन दो युवकों की चुनौती का
इन दो ख़ाली कुर्सियों का
         क्या जवाब है ?