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पास जो भी था / हरीश भादानी

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पास जो भी था
सभी कुछ दे दिया
अपनों-परायों को-
केवल एक ही रक्खा ईमान
और वह भी जीने के लिए-
सोचा था-
इस धूप से ईमान के सहारे
ढाँप जाऊँगा मैं
नंगे सपनों से भरे आकाश को
और पानी के छलावे भर दिखाकर
मैं भगाए ले चलूँगा
दूर, लम्बे दूर
सूखे देश जन्में सांसों के हरिन को;
कहा ईमान ने तो
आंधियों की बाढ़ में डुबो दिए सपने
और गिन-गिन तोड़ डाले
पिछली यादों के झरोखे;
यह ईमान
जिससे दुश्मनी गांठे हुए यमराज
मेरी ड्योढी से
चुराकर ले गए कुछ
और ले जाने अकुला रहे हैं;
ओ,
थोड़ी दूर भर के साथियों !
थक गए हो तो
तुम्हें अपने चरण दे दूँ
कहो तो
तुमको अपनी आस्थाओं से सींचू-सँवारूँ
ओ,
थोड़ो दूर भर के साथियों !
सौगंध है तुमको हमारे साथ की
सौगंध है तुमको मेरी बग़ावत की
मांगो न वह ईमान
मैं जिसके सहारे चल रहा हूँ
मैं, धर्म की माँ,
धर्म का बाप इस ईमान का-
कैसे छोड़ दूँ इसको
जिसके सहारे जी रहा हूँ !
पास जो भी था
सभ्ज्ञी कुछ दे दिया अपनो-परायो को !