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पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह / दाग़ देहलवी

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पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह
निगाहें कहती हैं सब राज़-ए-दिल ज़ुबां की तरह

जला के दाग़-ए-मुहब्बत ने दिल को ख़ाक किया
बहार आई मेरे बाग में ख़िज़ां की तरह

तलाश-ए-यार में छोड़ी न सर-ज़मीं कोई
हमारे पांव में चक्कर हैं आसमां की तरह

अदा-ए-मत्लब-ए-दिल हमसे सीख जाए कोई
उन्हें सुना ही दिया हाल दास्तां की तरह