भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

पुण्यसलिला / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 
है पुनीत कल्लोल सकल कलिकलुष-विदारी।
है करती शुचि लोल लहर सुरलोक-बिहारी।
भूरि भाव मय अभय भँवर है भवभय खोती।
अमल धावल जलराशि है समल मानस धाोती।
बहुपूत चरित विलसित पुलिन है पामरता-पुंज यम।
है विमल बालुका पाप-कुल-कदन काल-करवाल सम।1।

वन्दनीयतम वेद मंत्रा से है अभिमंत्रिात।
आगम के गुणगान-मंच पर है आमंत्रिात।
वाल्मीक की कान्त उक्ति से है अभिनन्दित।
भारत के कविता-कलाप द्वारा है वन्दित।
नाना-पुराण यश-गान से है महान-गौरव भरी।
सुरलोक-समागत शुचि-सलिल भूसुर-सेवित-सुरसरी।2।

पाहन उर से हो प्रसूत सुरधाुनि की धारा।
द्रवीभूत है परम, मृदुलता-चरम-सहारा।
रज-लुंठित हो रुचिर-रजत-सम कान्तिवती है।
असरल-गति हो सहज-सरलता-मूर्तिमती है।
हो निम्न-गामिनी कर सकी हिमगिरि-शिर ऊँचा परम।
संगम द्वारा उसके हुआ पतित-पयोनिधिा पूज्यतम।3।

ब्रज-भू ब्रजवल्लभ पुनीत रस से बहु-सरसी।
है कलिन्द-नन्दिनी अंक में उसके बिलसी।
अवधा अवधापति वर-विभूति से भूतिवती बन।
सरयू उसमें हुई लीन कर के विलीन तन।
भारत-गौरव नरदेव के गौरव से हो गौरवित।
कर सुर समान बहु असुर को अवनि लसि है सुरसरित।4।

जो यह भारत-धारा न सुर धाुनि-धारा पाती।
सुजला सुफला शस्य-श्यामला क्यों कहलाती।
उपबन अति-रमणीय विपिन नन्दन-बन जैसे।
कल्प-तुल्य पादप-समूह पा सकती कैसे।
बिलसित उसमें क्यों दीखते अमरावति ऐसे नगर।
जिनकी विलोक महनीयता मोहित होते हैं अमर।5।

है वह माता दयामयी ममता में माती।
है अतीव-अनुराग साथ पय-मधाुर पिलाती।
भाँति भाँति के अन्न अनूठे फल है देती।
रुज भयावने निज प्रभाव से है हर लेती।
कानों में परम-विमुग्धा-कर मधाुमय-धवनि है डालती।
कई कोटि संतान को प्रतिदिन है प्रतिपालती।6।

भूतनाथ किस भाँति भवानी-पति कहलाते।
पामर-परम, पुनीत-अमर-पद कैसे पाते।
आर्य-भूमि में आर्य-कीर्ति-धारा क्यों बहती।
तीर्थराजता तीर्थराज में कैसे रहती।
क्यों सती के सदृश दूसरी दुहिता पाता हिम अचल।
क्यों कमला के बदले जलधिा पाता हरिपद कमलजल।7।

राजा हो या रंक अंक में सब को लेगी।
चींटी को भी नीर चतुर्मुख के सम देगी।
काँटों से हो भरी कुसुम-कुल की हो थाती।
सभी भूमि पर सुधाातुल्य है सुधाा बहाती।
जीते है जीवन-दायिनी अमर बनाती है मरे।
जो तरे न तारे और के वे सुरसरि तारे तरे।8।

चतुरानन ने उसे चतुरता से अपनाया।
पंचानन ने शिर पर आदर सहित चढ़ाया।
सहस-नयन के सहस-नयन में रही समाई।
लाखों मुख से गयी गुणावलि उसकी गाई।
कर मुक्ति-कामना कूल पर कई कोटि मानव मरे।
पीपी उसका पावन-सलिल अमित-अपावन हैं तरे।9।

फैली हिमगिरि से समुद्र तक सुरसरि धारा।
काम हमारा सदा साधा सकती है सारा।
विपुल अमानव का वह मानव कर लेवेगी।
जीवित जाति समान सबल जीवन देवेगी।
जो बल हो बुध्दि विवेक हो वैभव हो विश्वास हो।
तो क्यों न बनें सुरतुल्य हम क्यों न स्वर्ग आवास हो।10।