भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पुरइन पात चढ़ि सुतली गउरा देइ / मगही

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

पुरइन पात चढ़ि सुतली[1] गउरा देइ।
सपना देखली अजगूत[2] हे॥1॥
टोला पड़ोसिन तुहूँ मोरा गोतनी।
सपना के करू न बिचार हे॥2॥
तुहूँ इयानी[3] गउरा तुहूँ सेयानी।
तुहूँ पंडितवा के धिया हे॥3॥
मोरँग[4] देस बाजन एक बाजे।
सिवजी के होयलइन[5] बियाह हे॥4॥
पेन्हऽ गउरा देइ इयरी से पियरी।
सउतिन परिछ[6] घर लावऽ[7] हे॥5॥
पुतहू जे रहतइ परिछि घर लइती[8]
सउतिन परिछलो[9] न जाय हे॥6॥
डँड़िया[10] उधारि जब देखलिन गउरा देइ।
इतो[11] हइ[12] बहिन हमार हे॥7॥
देस पइसि[13] बहिनी बरो[14] न मिलल।
तुहूँ भेल सउतिन हमार हे॥8॥
अइसन असीस बहिनी हमरा के दीह।
जुग जुग बढ़ी अहिवात हे॥9॥
मँगिया के जुड़ल[15] सीतल रहिहऽ हे बहिनी।
कोखिया[16] के होइहऽ[17] बिहून[18] हे॥10॥
सार[19] पइसी बहिनी गोबर कढ़िहऽ[20]
सिव जी के पास मत जाहु हे॥11॥

शब्दार्थ
  1. सोई
  2. विचित्र; बेमेल
  3. सयानी का अनुवादात्मक प्रयोग
  4. नेपाल का एक पूर्वी जिला, जो पूर्णियाँ जिले की सीमा से मिला है
  5. हुआ
  6. परिछने। ‘परिछन’ की विधि संपन्न करने
  7. लाओ
  8. लाती
  9. परिछा भी
  10. पालकी
  11. यह तो
  12. है
  13. देस पइसि = सारे देश में घूमने पर, पइस = प्रवेश
  14. दुलहा
  15. मँगिया के जुड़ल = सौभाग्यवती। माँग का सुहाग अचल रहे
  16. कोख से
  17. होना
  18. हीन। कोखिया-बिहून = कोख से हीन, निःसंतान
  19. गोशाला
  20. काढ़ना