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पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाय / शीन काफ़ निज़ाम

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पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाय
ज़ालिम हवा-ए-शहर है इज्ज़त भी ले न जाय

वहशत तो संगो-खिश्त की तरतीब ले गई
अब फिक़्र ये है दश्त की वुसअत भी ले न जाय

पीछे पड़ा है सब के जो परछाइयों का पाप
हम से अदावतों की वो आदत भी ले न जाय

आँगन उजड़ गया है तो ग़म उसका ताब के
मुहतात रह कि अब के वो ये छत भी ले न जाय

बरबादियाँ समेटने का उसको शौक है
लेकिन वो उन के नाम पर बरकत भी ले न जाय

आदिल है उसके अद्ल पर हमको यक़ीन है
लेकिन वो ज़ुल्म सहने की हिम्मत भी ले न जाय

उन सुह्बतों का ज़िक्र तो ज़िक्र-ए-फज़ूल है
दर है कि लुत्फ़ ए शुक्रो-शिकायत भी ले न जाय

ख़ुद से भी बढ़ के उस पे भरोसा न कीजिये
वो आइना है देखिये सूरत भी ले न जाय