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पोंछता अश्क अगर गोश-ए-दामां होता / इमाम बख़्श 'नासिख'

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पोंछता अश्क अगर गोश-ए-दामां होता
चाक करता मैं जुनूं में जो गरीबां होता

माल मिलता जो फ़लक से ज़रर जां होता
सर न होता जो मयस्सर मुझे सामां होता

मुँह को दामन से छुपाकर जो वो रक़सां होता
शोल-ए-हुस्न चराग़-ए-तह-ए-दामां होता

दिल-ए-मुश्ताक़ में गर जलव-ए-जानां होता
रोज़ इस कुंज़-ए-शीदां में चराग़ां होता

ज़ुल्फ़ से उसकी तो तशबीह न देते शायर
ईं क़दर हाल न संबल का परेशां होता

इस तरह मुँह पे जो फिरने नहीं देता है बजा
महव दीनदार से क्यों कर ख़त-ए-कुरां होता

अपने होटों से जो इक बार लगा लेता वो
है यक़ीं साग़र-ए-मै चश्म-ए-हैवां होता