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प्यार एहसास वफ़ा वक़्त दवा रक्खा है / सूरज राय 'सूरज'

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प्यार एहसास वफ़ा वक़्त दवा रक्खा है।
हमने तो आईने का नाम ख़ुदा रक्खा है॥

रात कुछ पंख मेरे फड़फड़ाये थे शायद
आज सय्याद ने दरबाने-हवा रक्खा है॥

लफ़्ज़ जिस दिन से हुए उसके ख़ार की सूरत
मेज से हमने भी गुलदान हटा रक्खा है॥

नफ़रतों ही की किताबों से पढ़ाते हैं जहां
कैसे स्कूल में ये नाम लिखा रक्खा है॥

मत जगाना मेरे एहसास को सच तुझको क़सम
झूठ की गोलियों से उसको सुला रक्खा है॥

दर्द है ख़्वाहिशें हैं ज़ख्मो-फ़ुग़ाँ है कि ज़हर
या ख़ुदा क्या है जो बेटी ने छुपा रक्खा है॥

मैं न कहता था कि दे जायेगा दग़ा "सूरज"
आओ इस दिल का दिया कबसे जला रक्खा है॥