भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

प्रियाजू! प्रीति-प्रसादी पाऊँ / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रीति-प्रसादी
राग जैत-कल्याण, आढ़ा 12.9.1974

प्रियाजू! प्रीति-प्रसादी पाऊँ।
जनम-जनमकी चेरि तिहारी, पद-पंकज परिहरि कित जाऊँ॥
यह मन चंचरीक[1] चरननको, और कतहुँ कोउ ठाउँ न पाऊँ।
रसत रहत सन्तत रति-रस यह-यही परम निज भाग्य मनाऊँ॥1॥
कृपा-कोर नित रहै तिहारी, पिय की प्यारी बात सुनाऊँ।
कबहुँ न न्यारी होहुँ छाँह तजि, तव मृदु मूरति हृदय बसाऊँ॥2॥
प्रीतमकी हो प्रान-पोसिनी, हौं हूँ जुगल-जोति नित ध्याऊँ।
जब-जब मिलन चलहु लालनसों आगे चलि-चलि गेल बताऊँ॥3॥
सुमति-कुमति कछु और न जानों, तुव रति-रसकों नित्य ललाऊँ।
हिये होत अब यही लालसा, मति न रहै रति[2] हो रह जाऊँ॥4॥
लोक जाय परलोक जाय अब, सुगति-कुगतिकी कुमति भुलाऊँ।
एकमात्र तुम हो मेरी गति, तुव रति-रस में ही रम जाऊँ॥5॥

शब्दार्थ
  1. भौंरा
  2. प्रीति