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प्रेमगीत / निकोलस गियेन / सुरेश सलिल

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तुम्हारी कोख तुम्हारे दिमाग से ज़्यादा जानती है
और उतना ही जितनी तुम्हारी जंघाएँ ।
वहीं है तुम्हारी निर्वस्त्र देह का
अड़ियल साँवला सम्मोहन !

तुम्हारे लाल कण्ठहारों
सोने के तुम्हारे जड़ाऊ कंगनों से शोभित वन
तुम्हारा प्रतीक है
और तुम्हारी आँखों की महानदी[1] में तिरता
वह उदास घड़ियाल ।
(1934)

शब्दार्थ
  1. यहाँ सन्दर्भ अफ़्रीका की सबसे लम्बी नदियों में से एक ज़म्बेज़ी नदी से है।