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प्रेम व्यापार / लीलाधर जगूड़ी

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किसी दिन तुमने कह दिया कि दिखाओ नदी
असल और सच्‍ची। तो मैं क्‍या करूँगा ?

आज तो यह कर सकता हूँ घर के सीले कोने में जाकर कहूँ
नल खोलो और नदी पी लो
लाओ घर भर का गंदा हफ्ता और इस छोर पर धो लो
नहाओ
खूब सपने में नाव पर घूमो
छोड़ो कहीं की अब तो अपने घर की ही है नदी

जो मैं परसाल न कर सका
उसका तुम इस साल भी माने हुए हो बुरा
सोचो घर की दीवार पर पानी सर टेके खड़ा हो
क्‍या यह सुख और खुशी दोनों नहीं है ?
पर किसी दिन तुमने कह दिया कि खोलो नल
और दिखाओ पानी। तो मैं क्‍या करूँगा ?

कूड़े पर कूड़ा बढ़ता जा रहा है
सुबह पर सुबह और शाम पर शाम खोता जा रहा हूँ मैं
तिस पर भी ढूँढ़ता हूँ कोई खुशी
साफ आसमान में जैसे बित्ते भर बादल
जिसके फैसले ही फिर बाढ़ आने वाली है
बीच अकाल नदी बौखलाने वाली है
टूटने वाले हैं बाँध
ऐसे में तुमने कह दिया कि मुझे सचमुच की नाव पर
घुमाओ। तो मैं क्‍या करूँगा?
नल खोलो। नल खोलो
मारे प्रेम के जो है सो उसकी पोल न खोलो
ठीक है कि इतने कमजोर पानी में लहरें नहीं उठतीं
डुबकियाँ नहीं लगतीं
न सही जमकर नहाना हाथ-पाँव ही धो लो
फिर सो लो

सुनहरे सपनों के लिए सोना जरूरी है
सपनों में खदेड़ लाऊँगा मैं
हिरनों की पूरी-पूरी डार
पूरे चंद्रमा के साथ नहाई हुई रातें
जिनमें तुम बाघ की धारियाँ तक गिन सकोगी
ऐसा माहौल होगा
कि बाजार भर में भूसे से भरी हुई हिरनियाँ भी
गर्भ धारण के लिए दौड़ने लगें

उन्‍हें ढूँढ़ते हुए आएँगे जंगली हिरन। थके-माँदे
पानी की ढूँढ़ में नदी तक
नदी की ढूँढ़ में नल तक
धुले हुए कपड़ों और मँजे हुए बर्तनों को देखकर
सीटियाती टोंटी से डरकर वे वापस चले जाएँगे
पर तुमने यदि कह दिया कि मृगछाल ला दो
या कि बाघंबर। तो मैं क्‍या करूँगा?