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प्रेयसी / कृष्ण कुमार यादव

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छोड़ देता हूँ निढाल
अपने को उसकी बाँहों में
बालों में अँगुलियाँ फिराते-फिराते
हर लिया है हर कष्ट को उसने ।

एक शिशु की तरह
सिमटा जा रहा हूँ
उसकी जकड़न में
कुछ देर बाद
ख़त्म हो जाता है
द्वैत का भाव ।

गहरी साँसों के बीच
उठती-गिरती धड़कनें
ख़ामोश हो जाती हैं
और मिलने लगती हैं आत्माएँ
मानो जन्म-जन्म की प्यासी हों ।

ऐसे ही किसी पल में
साकार होता है
एक नवजीवन का स्वप्न ।