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फ़र्क / स्वप्निल श्रीवास्तव

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बहुत-सी मौतें हत्या की तरह होती है
उसे हम अन्त तक नही जान पाते
आदमी की मृत्यु स्वाभाविक दिखती है
यह पता नही चलता उसे कितने सलीके से
मारा गया है
उसकी मृत्यु सिर्फ़ मृत्यु दिखाई देती है ।

कुछ दिनो बाद लोग हत्या और मृत्यु का फ़र्क
भूल जाते है ।
इतिहास में ऐसी बहुत सी मौतें दर्ज हैं
जो वास्तव में हत्याएँ हैं ।
जो हत्याएँ करते हैं उन्हें भी मार दिया
जाता है ।

हत्यायों और मृत्यु का फ़र्क कम होता जा रहा है
यह सब तफ़्तीश का कमाल है ।