भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

फ़िलिस्तीन के प्रेमी / महमूद दरवेश

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ओ मेरी प्रिया !
दर्द भरी तेरी आँखें
बेधती हैं मेरे हृदय को
जब भी मैं याद करता हूँ उन्हें

उनमें गरजती है बिजली
दहकता है गुस्सा
वियोग झलकता है उनमें
और मैं सम्हाल कर रखता हूँ तेरा दर्द

आकाश में चमक रहे हैं सहस्त्रों सितारे
घायल है मेरा हृदय
उस पर भी हैं हज़ारों घाव
तेरा दर्द मेरे प्यार का विस्तार है
एक पुल है
वर्तमान और भावी दिनों के बीच

भला, कैसे भूल सकता हूँ मैं
तेरी आँखों में चमकते वे दिन
बचपन के वे साल
जब साथ-साथ बड़े हुए थे हम

तब मुझे लगता था, मेरी प्रिया !
कि तेरी उन बड़ी-बड़ी आँखों में
जल रही है आग
और मैं गाने लगता था
उनके बारे में नए-नए गीत

पर आज
निर्वासन की यह भयानक ठण्ड
बरसा रही है आग
मेरे होंठॊं को जला रही है
भद्‍दे ढंग से, बेरहमी के साथ

आज
वीरान पड़े हैं वे मकान
छोड़ने पड़े थे जो हमें
पक्षी तक नहीं बैठते अब
उनकी मुण्डेरों पर

तड़कने लगे हैं आइने
आज़ादी की मौत के इस जश्न पर
और हम
बीनते हुए लोकगीतों के टुकड़े
आँक रहे हैं क़ीमत जन्मभूमि की

नए-पुराने सुरीले गिटारों पर
हम गाते हैं शब्द-शब्द
अपने गीत
और रचते हैं धुनें नई-नई
रुदन करते अपने
उन वीरान पड़े मकानों पर

ओ जानम् !
हमारा प्यार जीवित है अब भी
अब भी सुनती है तू मेरी आवाज़
बीते समय के साथ-साथ धीमी ज़रूर हो गई वो
पर कमज़ोर नहीं हुई

ओ युवा ग्वालन ! मैं देख रहा हूँ तुझे
काँटों भरी राह पर दौड़ते हुए
गायों और भेड़ों के रेवड़ के पीछे
तू गुज़र रही है
खण्डहर हुए एक घर के पास से
जिसका प्रवेश-द्वार बदल गया है राख में

मैं देख रहा हूँ तुझे
मेरी प्रिया !
लाइन में लगे हुए
सूख रहे एक कुएँ के पास

ओ रात्रिकालीन होटलों में बरतन मलने वाली !
मैं देख रहा हूँ तुझे लेटे हुए
चिथड़ा-चिथड़ा एक तम्बू में
उन अलावों के पास
जलाया है जिन्हें अनाथ बच्चों ने
और याद कर रहे हैं जो
घर के चूल्हे की आग

मुझे विश्वास है, मेरी जान !
चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े तुझे
कैसे भी क्यों न रहना पड़े
चलना पड़े चाहे किसी भी राह पर
निर्वासन की इस आग में, उदासी में
बनी रहेगी तू वैसे ही
जैसे बरकरार है सूरज
समुद्र
और हमारी शानदार यह धरती
हज़ारों-हज़ार बरस से

मुझे क़सम है, तेरे इस रुमाल की
जो तूने उपहारित किया था मुझे
विदा करते हुए
मैं क़सम खाता हूँ, जानम् !
तेरी काली घनी बरौनियों की
मुझे क़सम है तेरी, मेरी जान !
अमर रहेगा फ़िलिस्तीन
हमारा भाग्य फ़िलिस्तीन

चमकते सूरज के नीचे
फ़िलिस्तीन मेरा है
चमकते चान्द के नीचे
फ़िलिस्तीन तेरा है
फ़िलिस्तीन हमारा है, हमारा ही रहेगा

अपने नए गीतों से हम
बेध देंगे ठिठुरती इस हवा को
सूखी धरती में डालेंगे नए बीज
अपने ख़ून से सींचेंगे
लुटे-पिटे खेतों की आत्मा और शरीर
फिर गुज़र जाएँगे लम्बे वर्ष
और उनमें पैदा होगी फ़सल घनी

          तेरा नाम — फ़िलिस्तीन
          तेरी दृष्टि — फ़िलिस्तीन
          तेरे नयन-नक़्श — फ़िलिस्तीन
          फ़िलिस्तीन — तेरी आशा
          फ़िलिस्तीन — तेरी आवाज़
          फ़िलिस्तीन — महिलोचित गरिमा तेरी
फ़िलिस्तीन जीएगी तू
तू मरेगी फ़िलिस्तीन

ओ मेरी प्रिया !
मेरी किताबों का सार और विचार है तू
मेरे गीतों की आग है
हर क्षण तूने सम्पूर्ण किया मेरा जीवन
तेरे बिना होता ये बरबाद और बेरंग
मेरे लिए एकमात्र सर्जक है तू
एकात्म है तू मेरी मातृभूमि के साथ
मेरे इस लबालब हृदय में

अँग्रेज़ी से अनुवाद : अनिल जनविजय