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फांसी का दिया हुक्म सुणा सही दिन और तारिख गिण कै / मेहर सिंह

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वार्ता- सज्जनों चापसिंह अपने महल में सोमवती से मिलने के पश्चात वापिस दरबार में हाजिर होता है तो उसे जेल में बंद कर दिया जाता है। उस समय चापसिंह अपने मन में क्या सोचता है-

जेळ के अन्दर बन्द चापसिंह शेर तैं गादड़ बण कै
फांसी का दिया हुक्म सुणा सही दिन और तारिख गिण कै।टेक

सोमवती का ख्याल यू दिल पै आवै सै कई कई बै
फेर मर्द पछतावण लाग्या पिछली बात गई पै
झूठे सीधे नेम करै ना आवै बात सही पै
कोए ना करीयो एतबार बीर का सुथरी शान नई पै
खसम तैं मिलता नाम धरैं ये पूत बिराणा जण कै।

अली झली और विपता जालिम कितनी पड़ती नर पै
पेट खड्डा आटण की खातिर पड़ै औटणी सिर पै
दुनिया ताने दिया करैगी लागैं बोल जिगर पै
एक चापसिंह फांसी टूंट्या या बीर छोड़ कै घर पैं
मेरी नाड तळे नै करवा दी कदे चाल्या करुथा तण कै

कर्मा नै तै न्यूं रोऊं सूं मैं मार्या करम गति नै
जिसकै साहरै जिआ करूं था डोबया उसै सती नै
सोने तै दिया राग बणा मैं डस लिया तेज रति नै
बोलण जोगा छोड़्या ना इस पापिण सोमवती नै
वो सांप मर्या फण मार आज जो रहै था भरोसै मण कै

करमां पै तै न्यूं रोऊं मेरी काया मैं दुःख गहरा
गौरमैंट की करूं नोकरी द्यूं सरहद पै पहरा
फौज में भर्ती ओ हुइओ जो बिन ब्याहा रहरया
फौजियां तै बूझ लियो जै गलत मेहरसिंह कह रह्या
खाकी तम्बू धरती मैं बिस्तर उड़ै कोण महल दे चिण कै।