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फिर इक तारा टूटा, मैंने मांग लिया मन्नत में तुझको / बलजीत सिंह मुन्तज़िर

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फिर इक तारा टूटा, मैंने मांग लिया मन्नत में तुझको ।
इस धरती पर जीते जी ही, पा भी लिया जन्नत में तुझको ।

तू मेरे बारे में जितना मिल कर भी न सोच सका,
उससे ज़्यादा जान चुका हूँ मैं अब तक ख़ल्वत[1] में तुझको ।

साँझ ढले सरगोशी[2] में जब सैयारों[3] से बात करे,
बाँटता है दिलशाद[4] फ़लक़[5] भी ख़्वाब कई रग़बत[6] में तुझको ।

मेरे हाथ की रेखाओं में नाम, निशाँ, चेहरा तेरा हो,
ख़्वाहिश है मेरी ये अज़ल[7] से के देखूँ क़िस्मत में तुझको ।

जान सकेगा तन्हाई की आँच में तप कर कैसा हूँ,
भेज रहा हूं अपनी हालत लिख कर मैं इस ख़त में तुझको ।

कितने दिन फ़ुरक़त[8] में गुज़रे, और जनम की ठौर नहीं
अब इस जन्म में शक़्ल दिखाऊँ क्या तो मैं ग़ुरबत[9] में तुझको ।।

शब्दार्थ
  1. एकाकीपन
  2. कानाफ़ूसी
  3. नक्षत्र
  4. -fदल को अच्छा लगने वाला
  5. आसमान
  6. स्नेह, लगाव
  7. आfदकाल से
  8. fवयोग
  9. ग़रीबी