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फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन / इक़बाल

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फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन[1]
मुझको फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़े-चमन[2]

फूल हैं सहरा[3] में या परियाँ क़तार अन्दर क़तार[4]
ऊदे-ऊदे, नीले-नीले पीले-पीले पैरहन[5]

बर्गे-गुल[6] पर रख गई शबनम का मोती बादे-सुब्ह[7]
और चमकाती है उस मोती को सूरज की किरन

हुस्ने-बेपरवा को अपनी बेनक़ाबी के लिए
हों अगर शहरों से बन[8] प्यारे तो शहर अच्छे कि बन

अपने मन में डूबकर पा जा सुराग़े -ज़िन्दगी[9]
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

मन की दुनिया, मन की दुनिया सूदो-मस्ती,जज़्बे-शौक़
तन की दुनिया तन की दुनिया सूदो-सौदा,मक्रो-फ़न[10]

पानी-पानी कर गई मुझको क़लन्दर की ये बात
तू झुका जब ग़ैर के आगे न मन तेरा न तन

शब्दार्थ
  1. उपवन और पहाड़ियाँ
  2. बाग़ का परिंदा
  3. रेगिस्तान
  4. पंक्ति
  5. वस्त्र
  6. फूलों के पत्ते
  7. प्रभात समीर
  8. वन/जंगल
  9. जीवन का संकेत
  10. कला और मक़्क़ारी