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फुर्क़त हुई जो सुबह का इक रश्क-ए-माह से / इमाम बख़्श 'नासिख'

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फुर्क़त हुई जो सुबह का इक रश्क-ए-माह से
ग़र्बाल आफ़ताब हुआ तीर-ए-आह से

आशिक़ को रंज हो तो हो माशूक़ को भी रंज
यूसुफ़ गिरा कुएँ में जुलेख़ा की चाह से

आई तवाफ़ में तेरी चश्म-ए-सियह जो याद
बिस्मिल हुए ग़ज़ाल-ए-हरम तीर-ए-आह से

ये ख़ुद नुमाइयां हैं के मोजिज़ नुमाइयां
रोशन है चश्म-ए-कोर तेरी गर्द-ए-राह से

मश्रिक से कांपना नहीं निकला ये बे सबब
खुर्शीद डर गया मेरे रोज़-ए-सियाह से

सुबह-ए-शब-फिराक़ को भूली उफ़क़ की राह
पर तैरगी है अख़्तर-ए-बख़्त-ए-सियाह से

हज्जाम ख़त-ए-यार बनते ही मर गया
आरिज़ का सब्ज़ा कम नहीं मरदम गयाह से

मोज़ी अगर है गोशा नशीं कुछ खतर नहीं
एज़ा है राहरो को फ़क़त ख़ार-ए-राह से

हर रोज़-ए-रोज़-ए-हिज्र है शब-शब-ए-फिराक़
नफ़रत हुई यहां के सफ़ेद-ओ-सियाह से

आता है याद हिज्र में रह-र हके रोवे यार
दिन रात मुझ को रंज है खुर्शी-ओ-माह से

‘नासिख़’ हुज़ुर हुज़ुर-ए-शाह-ए-ज़मन हश्र तक रहें
बंदे हज़ारों हशमत व इक़बाल-ओ-जाह से