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फूट / रामचंद्र शुक्ल

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अरे फूट! क्या कहीं जगत में ठाम नहीं तू पाती।
पैर पसार यहीं पर जो तू आठो पहर बिताती ।।
 
कई सहस्र वर्ष से हैं तू भारत भुव पर छाई।
मनमानी इतने दिन करके अब भी नहीं अघाई ।।
 
तेरी लीला गाते हैं हम निशि दिन भारतवासी।
तेरा अतुल प्रताप सोचकर होती हमें उदासी ।।
 
पकड़ हाथ लक्ष्मी का तूने सिन्धु पार पहुँचाया।
सरस्वती का रंग उखाड़ा सारा जमा जमाया ।।
 
कलह द्वेष अपने प्रिय अनुचर लाकर यहाँ बसाए।
हाट बाट प्रसाद कुटी में डेरे इनके छाए ।।
 
फैलाई जब आर्य्य जाति ने विद्या बल की बेली।
गर्व चूर करने को तब तू गई यहाँ पर ठेली ।।
 
अब तो साध चुकी वह कारज विपति बीज बहु बोए।
पिसकर चूर-चूर हम हो तब चूर मोह में सोए ।।
 
घर घर फोड़ चुकी जब तब तू बन्धु बन्धु से फोड़े।
अब तो हैं मिट्टी के ढेले जिन्हें मेघ ने छोड़े ।।
 
फोड़ फाड़ उनको ही बस अब चारों ओर उड़ाओ।
भूखे भारतवासी जग को उनकी धूल फँकाओ ।।
 
 
जब जब चाहा उठें सहारा लेकर नींद निवारें।
ईधर उधर कुछ अंग हिलाकर सिर से संकट टारें ।।
 
तब तब तुमने गर्ज्जन करके विकट रूप दिखलाया।
किया ढकेल किनारे ज्यों का त्यों फिर हमें गिराया ।।
 
ब्रिटिश जाति के न्याय नीति की मची धूम जब भारी।
सुख के स्वप्न दिखाई देने लगे हमें दुखहारी ।।
 
उठे चौंक कर बन्धु कई जो थे सचेत औ ज्ञानी।
मिलकर यही बिचारा रोवैं अपनी रामकहानी ।।
 
ब्रिटिश न्याय की अनल शिखा को अपनी ओर घुमावें।
जिसमें पड़कर सभी हमारे दुख दरिद्र जल जावें ।।
 
फिर से उस भूतल के ऊपर हम भी मनुज कहावें।
परम प्रबल अंग्रेज जाति का प्रलय तलक यश गावें ।।
 
दादा भाई और अयोध्यानाथ सुरेन्द्र सयाने।
देश दशा को खोल खोल तब सबको लगे सुझाने ।।
 
मेहता, माधव, दत्ता, घोष का घोष देश में छाया।
आँख खोल हम लगे चेतने अपना और पराया ।।
 
यह प्रतिवर्ष सभा जब जमकर लगी पुकार मचाने।
कई क्रूरता के कृमि शासक उसको उठे दबाने ।।
 
जो अनुचित अधिकार भोग के लोलुप अत्याचारी।
जीवों पर आत जमाने में जिनको सुख भारी ।।
 
लोग यत्न करते जिसमें यह दशा यथार्थ हमारी।
प्रकट न होने पावे जग में रहे यही क्रम जारी ।।
 
 
किंतु आज बाईस वर्ष तक कितने झोंके खाती।
अन्यायी को लज्जित करती न्याय छटा छहराती ।।
 
यह जातीय सभा हम सबको समय ठेलती आई।
हाय फूट! तेरे आनन में वह भी आज समाई ।।
 
पहिली धौल कसी काशी में किन्तु फोड़ नहिं पाया।
कलकत्तो में जाकर तूने कड़ा प्रहार जमाया ।।
 
हुए फूटकर दो दल उसके चौंका देश हमारा।
किन्तु बिगड़ता तब तक कुछ भी हमने नहीं बिचारा ।।
 
यही समझते थे दोनों दल पृथक् पंथ अनुयायी।
होकर भी उद्देश्य हानि को सह न सकैंगे, भाई! ।।
 
किन्तु देख सूरत की सूरत भगे भाव यह सारे।
आशंका तब तरह-तरह की मन में उठी हमारे ।।
 
अब पुकार भारत के दुख की देगी कहाँ सुनाई?
कहाँ फिरेगी न्याय नीति के बल की प्रबल दुहाई? ।।
 
दश सहस्र भारत सुपुत्र मिल कहाँ प्रेम प्रगटैंगे?
गर्व सहित गर्जन करके निज गौरव गान करैंगे ।।
 
अब तो कर कुछ कृपा कि जिससे एक फिर सभी होवैं।
अपने मन की मैल देश की अश्रु धार में धोवैं ।।
 
जो जो सिर पर बीती उसको जी से बेगि भुलावें।
मौन मार निज मातृभूमि की सेवा में लग जावें ।।

('आनंद कादंबिनी', पूस-माघ, 1964 वि.)