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बचपन-1 / मुनव्वर राना

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कम से कम बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
                          **
जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी
जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं
                          **
जिस्म पर मेरे बहुत शफ़्फ़ाफ़ [1]कपड़े थे मगर
धूल-मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा
                         **
भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो
शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा
                         **
अगर इस्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिंदों के न होने से शजर[2]अच्छा नहीं लगता
                         **
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है

                        **

शब्दार्थ
  1. साफ़ ,चमकदार
  2. पेड़, वृक्ष