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बड़े कमरे में आइना / कंस्तांतिन कवाफ़ी

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था आलीशान घर के दाखिले पर
एक आदमकद, बहुत पुराना आइना,
जिसे हो न हो अस्सी बरस पहले तो खरीदा ही गया था ।
एक असाधारण ख़ूबसूरत लड़का, एक दर्ज़ी का नौकर
(इतवार के दिनों में एक नौसिखिया धावक)
खड़ा था एक पार्सल थामे । इसे सौंप दिया उसने
किसी को घर में, जो इसे अंदर ले गया
पावती लाने । दर्ज़ी का नौकर
छूट गया अकेला अपने संग, और उसने इंतज़ार किया ।
वह आइने के सामने गया और अपने पर एक नज़र डाली ।
और सीधी की उसने अपनी टाई ।
पाँच मिनट बाद
वे पावती वापस लाए ।
इसे ले वह चला गया ।

लेकिन पुराना आइना जिसने देखे थे और देखे
अपने अस्तित्व के लंबे, लंबे सालों के दौरान,
हज़ारों चीज़ें और चेहरे,
इस दफ़े लेकिन पुराना आइना आनंदित था,
और इसने महसूसा गर्व कि इसमें पाया था अपने में
कुछेक लम्हों के लिए अनिन्द्य सौंदर्य का एक बिंब ।

 
अँग्रेज़ी से अनुवाद : पीयूष दईया