भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बदलती रुत का सितम सब पे एक जैसा था / मेहर गेरा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 
बदलती रुत का सितम सब पे एक जैसा था
झड़े जो बर्ग तो हर एक पेड़ तन्हा था

तमाम उम्र रहा उसको अब्र का एहसास
न जाने कौनसी रुत में वो शख्स भीगा था

उसे खुशी के सफ़र का अज़ाब खत्म हुआ
मुझे ये ग़म कि भरे शहर में अकेला था

ये ज़िन्दगी तो है इक मुस्कुराहटों का सफ़र
ये जान कर ही वो हर हादसे पे हंसता था

हरेक रंग ही उसका था माइले-गुफ्तार
जहां जहां से भी देखा उसे वो चेहरा था।