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बदला है क्या, कुछ भी नहीं, तुम भी वही, हम भी वही / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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बदला है क्या, कुछ भी नहीं, तुम भी वही, हम भी वही
फिर दरमियाँ क्यों फ़ासले, क्यों बन गई दीवार-सी

रिश्तों की ये क्या डोर है, कैसी है ये जादूगरी
मुझमें कोई रहता भी है, बनकर मगर इक अजनबी

ठहरा है कब वक़्त एक सा, रुत हो कोई बदली सभी
अब धूप है, अब छाँव है, अब तीरगी, अब रोशनी

मायूसियों की आँधियाँ, थक जाएँगी, थम जाएँगी
बुझने नहीं देना है ये उम्मीद का दीपक कभी

महफ़ूज़ रख, बेदाग़ रख, मैली न कर ताज़िंदगी
मिलती नहीं इंसान को किरदार की चादर नई

मज़िल है क्या, रस्ता है क्या, सीखा है जो मुझसे सभी
वो शख़्स ही करने लगा आकर मेरी अब रहबरी

समझा वही शाहिद मेरे अहसास भी, जज़्बात भी
थोड़ा बहुत पानी यहाँ आँखों में है जिस शख़्स की