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बरहना फ़की़र / अली सरदार जाफ़री

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बरह्ना[1] फ़की़र
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मिरी ज़िन्दगी, तिरी ज़िन्दगी
यह जो एक कुह्ना लबादा है
हैं कशीदा इस पे हज़ार गुल
कोई ख़ून से कोई शो’ला से
कोई अश्क से कोई आह से
कोई खौ़फ़ और गुनाह से
कोई इक तबस्सुमे-ज़ेरे-लब
कोई हर्फ़े-नीम-निगाह से
कोई कम है याँ[2] न ज़्यादा है
मिरी ज़िन्दगी, तिरी ज़िन्दगी
यह जो एक कुह्ना लबादा है

अदम एक बरह्ना फ़क़ीर है
कि लिबास जिसका हवाएँ हैं
कि लिबास जिसका दिशाएँ हैं
कभी चाँद को वह पहनता है
कभी ढाँपता है बदन को वह
नए आफ़ताब के नूर से
कभी रंगे-गुल के कतान से
मगर इसके बाद भी वह फ़क़ीर
यूँही घूमता है बरह्ना तक
कि क़बाए-ज़ुलमतो-नूर में
कभी छु सका न वह बे-बदन

मिरी ज़िन्दगी, तिरी ज़िन्दगी
उसे देती है नया पैरहन
यह वुजूद हिकमते सादा है
जो बरह्नगी-ए-अदम को रोज़
नया इक लिबास पहनाता है

शब्दार्थ
  1. निर्वस्त्र
  2. यहाँ