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बर्फ़ है रात, मगर यार पिघलती ही नहीं / शीन काफ़ निज़ाम

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बर्फ़ है रात मगर यार पिघलती ही नहीं
जम गई ज़ेह्न में ऐसी कि निकलती ही नहीं

उम्र की तह से जाएँ तो पलटती ही नहीं
एक ही रुख़ पे हैं वो चाल बदलती ही नहीं

ग़ुस्ल कर जाती है चुपचाप मिरी आँखों में
राह में ख़ार उगे हैं प' अटकती ही नहीं

अब उजालों पे अंधेरों के गुमाँ होता है
रात तो राह किसी तौर भटकती ही नहीं

शाम, शमशान-सी वीरान है, जाने कब से
और समझाऊँ सहर को तो समझती ही नहीं