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बस अब मैं रात दिन की ये अज़ीयत सह नहीं सकता / मेला राम 'वफ़ा'

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बस अब मैं रात दिन की यर अज़ीयत सह नहीं सकता
कि सब कुछ देखता हूँ और कुछ भी कह नहीं सकता

कोई अंदेशाए-ताज़ीर से कुछ कह नहीं सकता
सितम वो हो रहे हैं आदमी जो सह नहीं सकता।

जहां में आम है मेरे अलम की दास्तां लेकिन
वो मुझ से सुन नहीं सकते मैं उनसे कह नहीं सकता।

तशुदद से कहां दबती है मज़लूमों की बैचैनी
कि ख़स में शोला-ए-बेताब पिंहां रह नहीं सकता।

अमां आगोशे-साहिल में भी उस को मिल नहीं सकती
जो दरिया में तलातुम के थपेड़े सह नहीं सकता।

फ़ना-आमादगी में है 'वफ़ा' राज़े-बक़ा पिन्हां
जिसे मरना नहीं आता वो ज़िंदा रह नहीं सकता।