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बहुत अन्धेरा है यहाँ / अदनान कफ़ील दरवेश

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मैं इनसान हूँ या कोई प्रेतात्मा
नहीं कह सकता
मैं भटकता रहता हूँ
यूनान, मेसोपोटामिया और हिन्दुस्तान के खण्डहरों में
दजला के तट की घास
कोटला फिरोज़शाह की भसकी दीवार
इमामबाड़े की मुलायम सीढ़ी
मैं ही तो हूँ ।

मैं कोई बेचैन प्रेतात्मा हूँ
जिसकी छलाँग समय की हथेली-भर है
सुनो ! मैं एक कलमा हूँ
जो तुम्हें किसी खोह में तड़पता मिलेगा
मैं एक गीत हूँ, जो अभी गाया नहीं गया
मैं एक पीड़ा हूँ, जो अभी पैदा नहीं हुई

इतिहास के काले अक्षर
मेरे जिस्म के हर हिस्से पर
गरम भाले की नोक से खुदे मिलेंगे तुम्हें
मैं एक औरत की जली हुई लाश हूँ
जो हर सभ्यता के मुहाने पर मिलेगी तुम्हें

मेरा संस्कार अभी बाक़ी रहा गया तुमसे
पीसा की झुकी मीनार-सा मेरा अस्तित्व
रात के ढाई बजे
तुम्हें पुकारता है

सुनो !
एक कन्दील जला दो
बहुत अन्धेरा है यहाँ
बहुत अन्धेरा है यहाँ ....।

(रचनाकाल : 2015)