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बहुत देर तक / सजीव सारथी

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बहुत देर तक,
यूहीं तकता रहा मैं,
परिंदों के उड़ते हुए काफिलों को,
बहुत देर तक,
यूहीं सुनता रहा मैं,
सरकते हुए वक्त की आहटों को,

बहुत देर तक,
डाल के सूखे पत्ते,
भरते रहे रंग आँखों में मेरे,
बहुत देर तक,
शाम की डूबी किरणें,
मिटाती रही जिंदगी के अंधेरे,

बहुत देर तक,
मेरा मांझी मुझको,
बचाता रहा भंवर से उलझनों की,
बहुत देर तक,
वो उदासी को थामे,
बैठा रहा दहलीज़ पे धड़कनों की,

बहुत देर तक,
उसके जाने के बाद भी,
ओढ़े रहा मैं उसकी परछाई को,
बहुत देर तक,
उसके एहसास ने,
सहारा दिया मेरी तन्हाई को,

बहुत देर तक...
हाँ...बहुत देर तक...