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बहुत बादल बरसे / नीना कुमार

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बरसे हैं बहुत हम पर, हैं यूँ मुसलसल[1] बरसे
आज अपने शहर में भी, हैं बहुत बादल बरसे

क्यों न फिर खामोश ज़हन के फैले बियाबाँ में
शोर उठे, कोई घटा छाये, कोई हलचल बरसे

जो तलातुम[2]-ए-जज़्बात रहा घूम फ़लक[3] पर
राह तक रहा है- के आज या फिर कल बरसे

और जो बर्फ से हो गए थे नमनाक[4] से एहसास
शोला-ए-बर्क़[5] के संग मिल कर के पिघल बरसे

काबिल-ए-बयाँ नहीं थे वो जो ख़्वाब निहाँ[6] थे
शोर-ओ-पैहम[7] में, आब-जू[8] बनके निकल बरसे

कभी माहताब[9] सा चमक जाता, सैलाब-ए-अब्र[10]
जैसे बोलती आँखों में से, है खामोश ग़ज़ल बरसे

शब्दार्थ
  1. लगातार
  2. तूफ़ान
  3. आकाश
  4. आंसू-भरे
  5. बिजली
  6. छिपे हुए
  7. लगातार शोर में
  8. नदी
  9. चांद
  10. बादलों की बाढ़