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बहुरिया / अवधेश कुमार जायसवाल

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हमरी बहुरिया छमकै छै अंगना
पैरोॅ में पायल आरोॅ हाथोॅ में कंगना।
अनबुझ पहेली सन, कहियोॅ सहेली सन
बिदकै छै बैल रकम, गमकै चमेली सन।
कखनू तेॅ शोला सन अगिया बैताल
अगले पल ओला सन पिघलै कमाल।
ममता केॅ मूरत सन, चन्दा केॅ सूरत सन
उधियाबै ऐसनोॅ कि माड़ोॅ बेकार।
कहियोॅ तेॅ गैया सन, कहियोॅ बतैहिया रं
काटै लेॅ दौड़ै छै दत कटनी कुतिया सन।
अगले पल पानी लेॅ, दुधवा कटोरा लेॅ
दौड़ै छै खेतवा में माथा कलौवा लेॅ।
खेतवा से आबै छै, मलिया भर तेल
कहियोॅ दौड़ाबै छै छाती पर रेल।
चहकै चिड़ैया सन, झगड़ै गोरैया रं
गलबा फुलै छै सूतल छै खटिया
बिरही चकोर सन जागै भर रतिया।
सनकी सवार तेॅ बोढ़नी चमकावै छै
उमकै छै प्यार तेॅ, ओड़नी ओढ़ाबै छै।
कहियोॅ तेॅ जूड़ा चमेली केॅ फूल
कहियोॅ तेॅ शंकर सन लेलेॅ त्रिशूल।
कहियोॅ तेॅ नकवा से नागिन रोॅ फूक।
अगले पल थूकी केॅ चाटै छै थूक।
कुछ्छु बुझाबै नै, दरिया कि दावानल
तैय्योॅ ओकरे दीवाना छी या पागल।