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बाज़ ख़त पुरअसर भी होते हैं / आलोक यादव

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बाज़ ख़त पुरअसर[1] भी होते हैं
नामाबर[2] चारागर[3] भी होते हैं

हुस्न की दिलकशी पे नाज़ न कर
आईने बदनज़र[4] भी होते हैं

तुम हुए हमसफ़र तो ये जाना
रास्ते मुख़्तसर[5] भी होते हैं

जान देने में सर बुलंदी है
प्यार का मोल सर भी होते हैं

इक हमीं मुंतज़िर[6] नहीं 'आलोक'
मुंतज़िर बाम-ओ-दर[7] भी होते हैं

शब्दार्थ
  1. असरदार
  2. डाकिया
  3. चिकित्सक
  4. बुरी नज़र
  5. छोटे/अल्प
  6. प्रतीक्षारत
  7. दरवाजे और झरोखे