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बाड़ के बारे में एक मुख्तसर ख़याल / मिरास्लाव होलुब / विनोद दास

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एक बाड़
न कहीं से शुरू होती है
न कहीं से खत्म

उस जगह को अलगाती है जहाँ वह है
उस जगह से जहाँ वह नहीं है

हालाँकि दुर्भाग्य से
हर बाड़ से पार होने की कुछ न कुछ गुँजायश होती है
कुछ छोटी चीज़ों के लिए
बाक़ी बड़ी चीज़ों के लिए

दरअसल बाड़ अलगाती नहीं बल्कि यह जताती है
कि कुछ चीजें अलगाई जानी चाहिए
और उसका उल्लँघन करने पर सज़ा मिलेगी

इस मायने में
बाड़ को अच्छी तरह व्यक्त करने के लिए
कोई गुस्साभरा लफ्ज़ भी दिया जा सकता है
अथवा किसी दफ़ा दिया जा सकता है नर्म लफ्ज़
लेकिन आमतौर से यह किसी को नहीं सूझता

लिहाज़ा इस मायने में
सही अर्थों में बाड़ वह है
जो कुछ नहीं को कुछ नहीं से अलगाती है
एक ऐसी जगह जहाँ कुछ नहीं है
एक ऐसी जगह से जहाँ भी कुछ नहीं है

एक मुकम्मल मायनों में, बस, यही है बाड़
कवि के लफ़्ज़ों में

अँग्रेज़ी से अनुवाद : विनोद दास